
इस चित्र, जो हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों के कुछ शिक्षक जो सीबीएसई की मानक से भाग रहे, को एआई की मदद तैयार किया है।
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
नियुक्ति के समय परीक्षा स्वीकार्य, तो सेवा काल में मूल्यांकन पर आपत्ति क्यों — शिक्षा व्यवस्था में आत्मपरीक्षण की आवश्यकता पर बहस तेज
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा लगभग 150 विद्यालयों को सेंट्रल बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन से संबद्ध कर शैक्षणिक मानकों को राष्ट्रीय कसौटी पर कसने की पहल ने व्यवस्था के भीतर छिपी एक असहज सच्चाई को सामने ला दिया है। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शिक्षकों की नियुक्ति में अनिवार्य परीक्षा और समय-समय पर मूल्यांकन की शर्त ने उस विरोधाभास को उजागर किया है, जिसमें विद्यार्थियों को मूल्यांकन का महत्व समझाने वाले कुछ कार्यरत शिक्षक स्वयं पुनर्परीक्षण से दूरी बना रहे हैं। यह प्रतिरोध केवल प्रशासनिक औपचारिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि पेशेगत उत्तरदायित्व, आत्मविश्वास और बदलते शैक्षिक परिवेश के साथ स्वयं को अद्यतन रखने की प्रतिबद्धता का भी संकेतक बन गया है।
शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की पुनर्परीक्षा और समय-समय पर मूल्यांकन को लेकर एक नई बहस खड़ी हो गई है। विशेषज्ञों और शिक्षा जगत से जुड़े प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि परीक्षा से असहजता का प्रश्न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और पेशेगत उत्तरदायित्व से भी जुड़ा है।
जानकारों का तर्क है कि जो शिक्षक विद्यार्थियों को परीक्षा से न घबराने की सीख देते हैं, उनके लिए स्वयं मूल्यांकन की प्रक्रिया से बचना एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है। नियुक्ति के समय परीक्षा को योग्यता का प्रमाण माना गया था, ऐसे में सेवा काल के दौरान पुनर्परीक्षण को संदेह की दृष्टि से देखना कई सवाल खड़े करता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ज्ञान कोई स्थिर संपत्ति नहीं है जिसे एक बार अर्जित कर सुरक्षित रख लिया जाए। बदलते पाठ्यक्रम, नई शिक्षण पद्धतियाँ और तकनीकी नवाचार निरंतर अध्ययन और आत्मपरिष्कार की मांग करते हैं। ऐसे में समय-समय पर मूल्यांकन को पेशे की गरिमा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
विचारकों का यह भी मानना है कि परीक्षा से भय प्रश्नपत्र का नहीं, बल्कि भीतर बैठे संदेह का होता है। जब व्यक्ति अपनी क्षमता पर आश्वस्त होता है तो परीक्षा उसके लिए अवसर बनती है। वहीं, असहजता यह संकेत देती है कि आत्ममंथन की आवश्यकता है।
शिक्षा क्षेत्र में उत्तरदायित्व एकतरफा नहीं हो सकता। जो व्यवस्था विद्यार्थियों को नियमित परीक्षा के दायरे में रखती है, उसमें शिक्षकों का मूल्यांकन भी गुणवत्ता सुनिश्चित करने का एक अंग माना जा रहा है।
फिलहाल, इस विषय पर शिक्षा जगत में चर्चा जारी है और इसे व्यापक शैक्षणिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में देखा जा रहा।
विडम्बना देखिए—दिल्ली पुलिस द्वारा भारतीय युवा कांग्रेस के सदस्यों की गिरफ्तारी जैसे राजनीतिक प्रसंग पर रातों-रात बयानबाज़ी करने वाले सभी दलों के जनप्रतिनिधि, शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मूलभूत और दीर्घकालिक प्रश्न पर असाधारण मौन साधे हुए हैं। मानो तात्कालिक राजनीतिक ताप ही उनकी प्राथमिकता हो और भविष्य की पीढ़ियों का बौद्धिक तापमान अप्रासंगिक। सत्ता और विपक्ष दोनों की यह चुप्पी संकेत देती है कि जहां वोट की तात्कालिक गणित नहीं दिखती, वहां संवेदनशील मुद्दे भी परिधि में डाल दिए जाते हैं। यदि राजनीति की धुरी केवल मत-समीकरण है, तो फिर गुणात्मक शिक्षा के नाम पर नैतिकता का आवरण ओढ़ने का औचित्य क्या रह जाता है?
दुर्भाग्य यह भी है कि अभिभावक, प्रबुद्ध वर्ग और सिविल सोसाइटी—जो शिक्षा सुधार के स्वाभाविक प्रहरी माने जाते हैं—वे भी धारा 10.3 में दी गई राहत जैसे निर्णयों पर उल्लेखनीय रूप से शांत हैं । क्या यह अनभिज्ञता है या समाज में पसरी शिथिलता ? यह सामूहिक मौन केवल एक नीति पर सहमति नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति उदासीनता का संकेत बनता जा रहा है। जब समाज ही जवाबदेही की मांग छोड़ दे, तो व्यवस्था से आत्मसुधार की अपेक्षा कैसे की जाए?
मीडिया की प्राथमिकताओं का तराजू भी कम रोचक नहीं है। शिक्षा जैसे दीर्घकालिक और राष्ट्रनिर्माण से जुड़े प्रश्न पर वह मानो कैमरा दूसरी दिशा में घुमा लेता है—शायद वहाँ टीआरपी की रोशनी उतनी तीखी नहीं पड़ती। रात भर सड़क और अदालत परिसर के बाहर खड़े होकर, सर्द हवाओं में लाइव कवरेज देते हुए भारतीय युवा कांग्रेस से जुड़े घटनाक्रम को सनसनी में बदलना आसान है; पर कक्षा के भीतर गुणवत्ता, जवाबदेही और मूल्यांकन पर गंभीर विमर्श खड़ा करना उतना ‘रोमांचक’ नहीं।
लगता है शोर में संभावनाएँ अधिक हैं और सुधार में जोखिम। परिणाम यह कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा पर बहस कैमरे की फ्रेम से बाहर रह जाती है—क्योंकि वह ब्रेकिंग नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मांगती है।