केंद्र-प्रदेश समन्वयहीनता से विकास को झटका, गरीबों के अधिकारों पर संकट”

दिसंबर 2022 में कर्ज में डूबे हिमाचल प्रदेश की कमान प्रदेश के लोगों ने भाजपा से छीनकर कांग्रेस पार्टी को सौंप दी । कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभालते व्यवस्था परिवर्तन कर प्रदेश की वित्तीय प्रशासकीय और राजनीतिक परिदृश्य बदलने के कुछ प्रयास शुरू किए । परंतु जुलाई अगस्त 2023 में ए अप्रत्याशित आपदा ने न केवल प्रदेश की अधोसंरचना को तबाह किया अपितु केंद्र और राज्य सरकार के रिश्तों में भी टकराव की स्थिति पैदा कर दी

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा

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प्रदेश में कांग्रेस सरकार को बने लगभग ढाई वर्ष हो चुके हैं, लेकिन इस अवधि में राज्य और केंद्र सरकार के बीच वांछित कार्य संयोजन (वर्किंग एडजस्टमेंट) स्थापित नहीं हो पाया है। जहां एक ओर राज्य सरकार केंद्र से अपेक्षित सहयोग नहीं पा रही है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार भी संघीय ढांचे के अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असफल दिख रही है।इस समन्वयहीनता के चलते हिमाचल प्रदेश विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है।

ऐसी दर्जनों घटनाएं व तथ्य हैं जो इस बात को पुख्ता करते हैं कि हिमाचल प्रदेश को वित्तीय हाशिए पर धकेला जा रहा है। केंद्र सरकार ने प्रदेश के आर्थिक संसाधनों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई अड़चनें खड़ी की हैं, जिससे राज्य की योजनाएं ठप होती जा रही हैं।

मनरेगा पर केंद्र की बड़ी चोट:

हाल ही में केंद्र सरकार ने हिमाचल की मनरेगा ग्रांट पर रोक लगा दी है। वर्ष 2025-26 के लिए प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित 470 लाख कार्य दिवस को कम कर 250 लाख कर दिया गया है। इस कटौती से 10.26 लाख गरीब पंजीकृत श्रमिकों के 145 लाख कार्य दिवस छिन लिए गए हैं, जो सीधे तौर पर लगभग 4.5 लाख परिवारों की आजीविका पर आघात है।

मनरेगा भुगतान में रोड़ा:गत चार महीनों में मनरेगा मद में 250 करोड़ श्रम, 200 करोड़ निर्माण सामग्री, और 11 करोड़ प्रशासनिक मद के भुगतान लंबित हैं। इसने न केवल कामगारों को संकट में डाला है, बल्कि गांव स्तर पर योजनाओं को भी अवरुद्ध किया है।

जुलाई 2023 में हिमाचल में आई अप्रत्याशित आपदा के बाद केंद्र सरकार ने राहत राशि देने में विलंब किया, जबकि समान परिस्थिति अन्य राज्यों को त्वरित सहायता दी गई। यह संघीय न्याय की भावना के विपरीत है। हिमाचल प्रदेश सरकार को अपने स्तर पर सीमित संसाधनों व कुछ अन्य योजनाओं में से पैसा काट कर प्रभावित लोगों के पुनर्वास व अधोसंरचना को दुरुस्त करने के लिए 4000 करोड़ का पैकेज दिया।

आपदा के बाद राज्य को पुनर्निर्माण हेतु संसाधन जुटाने की जरूरत थी, अतिरिक्त पैसे की जरूरत थी लेकिन केंद्र सरकार ने उल्टा हिमाचल की कर्ज सीमा पर जुलाई 2024 से अप्रैल 2025 तक कठोर बंदिशें लगा दी हैं।

सुप्रीम कोर्ट अवार्ड पर चुप्पी:पंजाब द्वारा बीबीएमबी के हिस्से के लगभग 3400 करोड़ रुपये की सुप्रीम कोर्ट से अवार्ड राशि दिलाने में भी केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की है, जिससे राज्य की राजस्व स्थिति पर और दबाव पड़ा है।

हाल ही उत्पन्न हरियाणा-पंजाब जल विवाद पर केंद्र ने तत्काल कार्रवाई करते हुए भाखड़ा डैम के निदेशक (जल) ईं आकाशदीप, जो पंजाब कोटे के थे, को हटाकर हरियाणा कोटे के संजीव कुमार को नियुक्त किया, जबकि हिमाचल स्थित पंजाब सरकार की शानन विद्युत परियोजना की लीज समाप्त होने के उपरांत परियोजना को वापस करने की हिमाचल की अर्जी को मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने यह कह कर नजरअंदाज कर दिया कि कोर्ट में केस है इसलिए केंद्र तत्टस्थ है।

जल उपकर पर कानूनी पेच:प्रदेश सरकार द्वारा जल विद्युत परियोजनाओं पर जल उपकर लगाने की योजना को भी कानूनी दांवपेच में उलझा दिया गया है, जबकि उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में यह व्यवस्था पहले से लागू है।

हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार और केंद्र सरकार के बीच चल रही नीतिगत असहमति और प्रशासनिक टकराव ने राज्य के विकास, आपदा प्रबंधन और गरीबों की आजीविका पर गंभीर असर डाला है। संघीय प्रणाली में संतुलन और समानता की जो अपेक्षा संविधान करता है, वह हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के साथ हो रहे व्यवहार में दिखाई नहीं देती।

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