मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

यूथ कांग्रेस के शर्टलेस प्रदर्शन को “नंगी” और “गंदी” सियासत कहकर नैतिकता का चोला ओढ़ने वाली भाजपा को न्यायालय की टिप्पणी ने असहज कर दिया है। जिस विरोध को सत्ता पक्ष ने ‘अराजकता’ और ‘राष्ट्रविरोध’ के रंग में रंगने की कोशिश की, उसे अदालत ने संवैधानिक असहमति की श्रेणी में रखा।

पटियाला हाउस कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘भारत मंडपम’ परिसर में हुआ प्रदर्शन न तो “आतंकवाद” था और न “विद्रोह”, बल्कि एक सांकेतिक और सीमित विरोध था—जो लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का स्वीकृत माध्यम है। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक व्यक्ति को राहत नहीं, बल्कि विरोध के अधिकार को वैधानिक पुष्टता प्रदान करती है भारतीय युवा कग्रेस के अध्यक्ष उदय भानु चिब्ब को राहत देते हुए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। पुलिस ने मामले को “संवेदनशील” बताकर प्रति देने से इनकार किया था, किंतु अदालत ने दो टूक कहा—“सिर्फ पुलिस के कह देने भर से कोई मामला संवेदनशील नहीं हो जाता।” यह टिप्पणी जांच एजेंसियों की विवेकाधीन शक्ति पर न्यायिक संतुलन का संकेत है।

कानूनी दृष्टि से भी यह आदेश महत्वपूर्ण है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि एफआईआर की प्रति आरोपित या संबंधित पक्ष को उपलब्ध कराना प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। पारदर्शिता न्याय का प्रथम सोपान है; यदि एफआईआर तक पहुँच रोकी जाए तो निष्पक्ष बचाव का अधिकार स्वतः बाधित होता है।

गूढ़ार्थ यह है कि लोकतंत्र में असहमति को आपराधिकता की परिभाषा में कैद नहीं किया जा सकता। विरोध की भाषा तीखी हो सकती है, प्रतीक असहज कर सकते हैं, परंतु जब तक वह हिंसा या विध्वंस में परिवर्तित न हो, उसे ‘विद्रोह’ का जामा पहनाना संवैधानिक भावना के विपरीत है। अदालत का यह हस्तक्षेप केवल एक मामले का निर्णय नहीं, बल्कि सत्ता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन की पुनर्पुष्टि है—जहाँ न्यायपालिका ने स्पष्ट किया कि कानून का दायरा राजनीतिक व्याख्याओं से बड़ा होता है।

इस प्रकरण ने यह भी रेखांकित किया है कि “संवेदनशीलता” का तर्क प्रशासनिक ढाल नहीं बन सकता। लोकतंत्र में संवेदनशील वही है, जो नागरिक अधिकारों की रक्षा करे—न कि वह, जो उन्हें सीमित करे।

जानकारी के अनुसार, इस प्रकरण से जुड़े तीन युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही दिल्ली पुलिस की टीम को हिमाचल प्रदेश में रोक लिया गया। बताया जा रहा है कि स्थानीय स्तर पर पुलिस की वैधानिक प्रक्रिया, ट्रांजिट रिमांड और समन्वय को लेकर आपत्तियाँ उठीं, जिसके चलते कार्रवाई को तत्काल प्रभाव से रोका गया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी राज्य से आरोपी को दूसरे राज्य में ले जाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं—विशेषकर ट्रांजिट रिमांड और स्थानीय पुलिस को सूचित करने—का पालन अनिवार्य होता है। ऐसे मामलों में जरा-सी चूक भी कार्रवाई को विवादास्पद बना सकती है।

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