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मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश

भानुपाली–बिलासपुर–बेरी रेलवे परियोजना, जिसे केंद्र सरकार “पहाड़ों को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ने की गौरवगाथा” कहती है, वस्तुतः हिमाचल की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन– तीनों पर एक साथ प्रहार है। विकास के नाम पर बुना गया यह स्टील का सपना दरअसल उस मिट्टी की सांसों को जकड़ने जा रहा है, जिसने हिमालय को अब तक जीवित रखा है।

यह परियोजना जहां काग़ज़ों में संपर्क का सेतु दिखाई देती है, वहीं ज़मीनी हकीकत में यह हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी का विघटन है। बिलासपुर ज़िले के लगभग ढाई से तीन हज़ार ट्रक सड़कों पर जंग खा जाएंगे; पांच से दस हज़ार ड्राइवर और क्लीनर बेरोज़गारी के अंधेरे में चले जाएंगे; सैकड़ों पेट्रोल पंप सूख जाएंगे; ढाबे, होटल, टायर–पंचर की दुकानें और छोटे व्यापारी — सबका चूल्हा ठंडा पड़ जाएगा। प्रदेश सरकार को करोड़ों के वैट का नुकसान होगा और जो व्यवस्था आज सड़कों से सांस ले रही है, वही रेल की पटरी के नीचे कुचल जाएगी।

(इस आर्थिक विन्यास पर विस्तृत विश्लेषण अलग से आएगा।)

असली संकट आर्थिक नहीं — पारिस्थितिक है।

भारतीय वन सर्वेक्षण की ISFR-2023 रिपोर्ट पर विशेषज्ञों ने पहले ही प्रश्न उठाए हैं कि विकास परियोजनाओं से हुए वास्तविक वन-क्षरण को गणना में शामिल ही नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, हिमाचल का वास्तविक वन क्षेत्र आंकड़ों की चादर में ढका हुआ है — जबकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि अवसंरचनात्मक गतिविधियों और निर्माण परियोजनाओं के फैलाव से यह हरियाली निरंतर घट रही है।

हिमालय की विशिष्ट पारिस्थितिक संवेदनशीलता को देखते हुए ऊपरी हिमालयी क्षेत्र को ‘ईको-सेंसिटिव ज़ोन’ घोषित करने की मांग बार-बार उठती रही है — क्योंकि यही वह कानूनी कवच है जो मानवजनित विनाशकारी गतिविधियों पर नियंत्रण का अधिकारिक आधार बनता है। लेकिन हिमाचल में विकास की होड़ ने इस संवेदनशीलता को लगभग अनसुना कर दिया है।

भूस्खलन, मूसलाधार वर्षा और बादल फटने की बढ़ती घटनाएँ इस विनाश के चेतावनी संकेत हैं। कुल्लू और शिमला जैसे ज़िलों में नदियाँ बार-बार अपना पुराना भूभाग वापस ले रही हैं — वे भूमि, जो चारलेन हाईवे, जलविद्युत परियोजनाओं और अंधाधुंध निर्माणों ने प्रकृति से छीन ली थी। दुखद यह है कि स्थानीय समाज भी राज्य के इसी तथाकथित विकास मॉडल का अनुसरण करते हुए अनजाने में हिमाचल की भूगर्भीय स्थिरता को स्वयं कमजोर कर रहा है।

कोलकाता नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की छात्रा-गरिमा ठाकुर-का कहना है कि इस परियोजना से 51,000 पेड़ों की बलि दी जाएगी, हजारों फलदार पौधे और जलस्रोत प्रभावित होंगे। यह न केवल हरियाली की हत्या होगी, बल्कि हिमालय की पारिस्थितिक नींव को हिला देने वाली घटना सिद्ध होगी। सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश की सुविधाजनक व्याख्या कर पेड़ काटने की अनुमति लेना, न्याय की आत्मा के साथ छल है — और रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 11 के तहत इस परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति से मुक्त करना, विनाश को वैधता देने का उदाहरण।

विशेषज्ञ यह भी इंगित करते हैं कि परियोजना के लिए 52.71 हेक्टेयर वनभूमि का अधिग्रहण, 2,143 वृक्षों की कटाई, और 35,000 से अधिक गैर-फलदार वृक्षों को हटाने की स्वीकृति — सब एक ऐसे तंत्र की उपज हैं, जिसने *न्यायिक निर्णयों की भावना* को अपने हित में मोड़ लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने जहाँ अपने आदेशों में केवल *लघु जनसुविधा परियोजनाओं* के लिए सीमित वनभूमि उपयोग की अनुमति दी थी, वहीं इस आदेश का हवाला देकर **भानुपली–बिलासपुर–बेरी जैसी विशाल परियोजना** को वैधता देना न्याय की भावना के साथ स्पष्ट खिलवाड़ है।

सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) रिपोर्ट में मिट्टी के कटाव, भू-स्खलन और जलप्रवाह अवरोध जैसी संभावनाओं को केवल औपचारिक रूप से उल्लेखित किया गया है, पर वास्तव में ये वही कारक हैं जो हर मानसून हिमाचल की नाजुक पारिस्थितिकी को चीर डालते हैं। मलबा निपटान का तथाकथित समाधान — “रेडी मिक्स कंक्रीट संयंत्रों में उपयोग” — सुनने में आकर्षक अवश्य है, पर पूर्व की परियोजनाओं का इतिहास बताता है कि यही मलबा नदियों, नालों और धाराओं की मृत्यु का कारण बना है।

पर्वतीय पारिस्थितिकी केवल मिट्टी और पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि एक जीवंत संतुलन है — जिसे विकास की अंधी रफ्तार डेविड स्ट्रॉन्ग की उस अवधारणा में बदल रही है जिसे उन्होंने कहा था — “flattening of mountaintops”, अर्थात् पहाड़ों को उनके स्वभाव से काटकर मनुष्य की आकृति में ढाल देना।

यही इस परियोजना का वास्तविक खतरा है — यह न केवल भूमि की, बल्कि पर्वतों की आत्मा और पारिस्थितिक मर्यादा का भी हनन है। मिट्टी की खुदाई से उत्पन्न ढीलापन न केवल पारिस्थितिक अस्थिरता को बढ़ाएगा, बल्कि परियोजना से निर्मित महंगी संरचनाओं के लिए भी प्रत्यक्ष खतरा बन जाएगा। एक ही भूस्खलन, एक ही बाढ़ इन संरचनाओं को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है — और फिर सुधार की प्रक्रिया में वही धन, वही तंत्र, वही गलती दोहराई जाएगी।

इन सबके बीच प्रश्न यही उठता है —

क्या यह रेल वास्तव में प्रगति की राह है या प्रकृति की पीड़ा का रेखांकन?

क्या यह संपर्क का सेतु है या विनाश की सुरंग?

हिमाचल और हिमालय का भविष्य लोहे की पटरी पर नहीं, मिट्टी की संवेदना, पेड़ों की छाया और मनुष्य–प्रकृति के सहजीव संतुलन पर निर्भर है।

रेल की सीटी चाहे विकास का प्रतीक लगे, पर अगर वह पहाड़ की नमी, माटी और रोज़गार की धड़कनों को चुप करा दे — तो वह प्रगति नहीं, संवेदना का अंत है।

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