
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
मई 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के राजनेताओं के लिए उम्र का 75 का पड़ाव मार्गदर्शकों का मार्ग अपने के सिद्धांत पर जो चतुर्दिक सराहना मिली थी वह अद्वितीय थी। लगभग समूचा हिंदुस्तान उन्हें आदर्श पुरुष कह रहा था। लोग मोदी की आदर्शवादी सोच के मुरीद हो रहा था। 75 का पड़ाव पार कर गए नेता एक अरब 30 करोड़ लोगों के देश में अकेले व असहाय महसूस करने लगे अतः धीरे-धीरे हाशिए पर खींची मार्गदर्शकों की लकीर पर खड़े हो गए और आज भी मार्गदर्शक बनकर प्रधानमंत्री मोदी के 75 वर्षों के पड़ाव पार करने पर मनाये जा रहे पखवाड़े को सूनी-सूनी आंखों देखा रहे हैं लेकिन जुवान खोलने पर बेबस हैं ।
राजनीति का सबसे बड़ा सार यही है कि सियासत के खेल के सिद्धांत कभी पत्थर पर लिखे नहीं जाते, वे हमेशा अवसर की धूप-छांव में ढलते रहते हैं। कभी कहा गया कि 75 वर्ष का पड़ाव पार करने के बाद सक्रिय राजनीति में स्थान नहीं होना चाहिए। इसी तर्क पर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों को किनारे कर दिया गया। संदेश साफ़ था—नई पीढ़ी को जगह दो।
लेकिन अब वही 75वां अंक जब मौजूदा नेतृत्व के हिस्से आया, तो गणित बदल गया। अब यह उम्र किसी “मर्यादा-रेखा” का प्रतीक नहीं, बल्कि “उत्सव-रेखा” बन गई है। दिनभर का जन्मदिन भी कम लगा, तो पूरे पखवाड़े का महोत्सव रच दिया गया। सवाल यह नहीं कि जश्न क्यों मनाया गया, सवाल यह है कि नियमों की परिभाषा व्यक्ति विशेष के हिसाब से क्यों बदल जाती है?
क्या राजनीति में उम्र केवल तब बोझ है जब सामने प्रतिद्वंद्वी हो? और वही उम्र तब गौरव का पर्व बन जाती है जब सत्ता की कुर्सी अपने पास हो? यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो 75 वर्ष कल तक “सेवानिवृत्ति की उम्र” थी, आज वही “स्वर्णिम उपलब्धि” घोषित हो गई।
जनता यह सब देख रही है। वह समझ रही है कि “सिद्धांत” यहां स्थायी मूल्य नहीं, बल्कि सुविधाजनक औजार हैं—जिनका इस्तेमाल कभी दूसरों को रोकने में होता है और कभी अपने लिए महिमा गढ़ने में।
राजनीति में उम्र बढ़ती जरूर है, पर सिद्धांत हमेशा जवान रहते हैं… क्योंकि उन्हें हर बार सत्ता की ज़रूरत के हिसाब से नया चोला पहनाया जाता है।