मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश 

हिमाचल की राजनीति में इन दिनों “तीसरे विकल्प” की चर्चा फिर हवा पकड़ रही है। सत्ता के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक यह सवाल तैर रहा है कि क्या राज्य में कांग्रेस-भाजपा से अलग कोई नई राजनीतिक धारा जन्म ले सकती है। पर इतिहास की परतें खोलकर देखें तो यह बहस नई नहीं है; यह हिमाचल की राजनीति में समय-समय पर उठती रही एक पुरानी प्रतिध्वनि है।

स्वतंत्रता के बाद से ही पहाड़ी राजनीति की धुरी लंबे समय तक  इंडियन नेशनल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1952 से 1972 तक के शुरुआती चुनावों में कांग्रेस का वर्चस्व लगभग निर्विवाद रहा। विपक्ष बिखरा हुआ था—कहीं भारतीय जनसंघ, कहीं समाजवादी या कम्युनिस्ट धारा, तो कहीं निर्दलीय नेताओं का स्थानीय प्रभाव। इस दौर में तीसरे विकल्प की कल्पना अक्सर कुछ असंतुष्ट नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से आगे नहीं बढ़ सकी।

1977 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उभरी जनता पार्टीकी लहर ने जरूर यह आभास दिया कि दोध्रुवीय राजनीति टूट सकती है। पर हिमाचल में यह प्रयोग भी स्थायी विकल्प नहीं बन पाया। बाद में यही वैचारिक धारा भारतीय जनता पार्टी के रूप में संगठित हुई और राज्य की राजनीति धीरे-धीरे कांग्रेस बनाम भाजपा के द्वंद्व में सिमटती चली गई।

इस बीच तीसरे विकल्प के कई छोटे-बड़े प्रयोग होते रहे। कभी चुनाव से पहले हारे-निकाले या दलों से असंतुष्ट नेता नया झंडा उठाते, कभी क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर मंच खड़ा किया जाता। पर अधिकतर प्रयास पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह बिखरते चले गए। अपवाद के रूप में  पंडित सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस ने कुछ समय के लिए राजनीतिक समीकरण बदलने का साहसिक प्रयास किया। लेकिन उस प्रयोग की राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा लाभ अंततः  प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा को ही मिला।

आज परिस्थितियां एक बार फिर बहस को जन्म दे रही हैं। भाजपा के भीतर उभरती तीखी अंतर्कलह और कांग्रेस की आंतरिक खींचतान ने उन नेताओं में नई उम्मीद जगाई है जो दोनों दलों के भीतर हाशिए पर चले गए हैं। ऐसे कई चेहरे फिर “तीसरे विकल्प” की सीढ़ी उठाकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देखने  लगे हैं। अपनी खबरों की तलाश में  थका हारा मीडिया भी  थकान को उतारने के उनके सपनों को सुर्खियों देकर उसी सीढ़ी का सहारा  ले रहा है। 

लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता भी उसी सीढ़ी पर चढ़ना चाहती है?
दरअसल हिमाचल की जनता आज तीसरे विकल्प की तलाश अवश्य कर रही है, पर वह तीसरा चेहरा नहीं, तीसरी सोच ढूंढ रही है—ऐसा विकास मॉडल, जो राजनीति की जर्जर बिसात पर पुराने और पीटे हुए मोहरों को फिर से सजाने का उपक्रम न हो।

यदि कोई नई धारा या विकास दृष्टिकोण हिमाचल की राजनीति में जन्म लेता है तो उसे केवल असंतुष्ट नेताओं, डा रामलाल मार्काण्डा, रमेश धवाला या किसी अन्य, की आकांक्षा से नहीं, बल्कि नई दृष्टि, नए विकास विमर्श और विश्वसनीय नेतृत्व से अपना रास्ता बनाना होगा। उसे तीन लाख  से अधिक सरकारी कर्मचारियों इतने ही पेंशन भोगियों और दस लाख से अधिक पढ़े लिखे बेराजगार को हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर तर्क से सहमत करना  होगा वरना इतिहास गवाह है—हिमाचल की पहाड़ियों में उठने वाली कई सियासी आंधियाँ अंततः सूखे पत्तों की तरह झर जाती हैं, और सत्ता का शिखर फिर उसी पुराने द्वंद्व के बीच सिमट जाता है।

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