
शिमला। डाक टिकट केवल डाक प्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति, इतिहास, साहित्य, प्रकृति और सभ्यता के जीवंत दस्तावेज होते हैं। इन्हीं अनमोल विरासतों को बाल मन और किशोर जिज्ञासा से जोड़ने के उद्देश्य से ईसीआई शैलेट डे स्कूल में एक प्रेरक एवं संवादात्मक फिलाटेली सत्र आयोजित किया गया। विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों की विशेष रुचि और सहयोग से आयोजित इस सत्र में वरिष्ठ एवं पैशनेट डाक टिकट संग्रहकर्ता स्मृति राणा और नीलम चंदेल तथा डाक विभाग के फिलाटेली ब्यूरो, शिमला के प्रभारी गौरव ने विद्यार्थियों के साथ जीवंत संवाद स्थापित किया। इस अवसर पर उन्होंने डाक टिकटों, चित्र पोस्टकार्डों और विशेष डाक निरस्तीकरणों (स्पेशल कैंसिलेशन) में निहित साहित्यिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक तथा राष्ट्रीय विरासत के विविध आयामों को सहज और रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। संवाद का उद्देश्य केवल डाक टिकट संग्रहण का परिचय देना नहीं, बल्कि बच्चों, युवाओं और अभिभावकों के मन में फिलाटेली को ज्ञान, शोध, सृजनात्मकता और राष्ट्रबोध से जुड़ी आजीवन रुचि के रूप में स्थापित करना था।
कार्यक्रम का प्रारम्भ स्मृति राणा की प्रभावशाली प्रस्तुति से हुआ। उन्होंने विद्यार्थियों को फिलाटेली की व्यापक दुनिया से परिचित कराते हुए बताया कि पिक्चर पोस्टकार्ड (PPC), परमानेंट पिक्टोरियल कैंसिलेशन तथा स्पेशल कैंसिलेशन केवल डाक सामग्री नहीं, बल्कि किसी क्षेत्र की ऐतिहासिक स्मृतियों, सांस्कृतिक पहचान, स्थापत्य, लोकजीवन और प्राकृतिक धरोहर के स्थायी अभिलेख हैं। उन्होंने कहा कि डाक टिकट संग्रहण ऐसा रचनात्मक शौक है, जो जिज्ञासा को ज्ञान, इतिहास को अनुभव और संग्रह को शोध में परिवर्तित करता है।
नीलम चंदेल ने पंचतंत्र आधारित विषयगत डाक टिकटों के माध्यम से बताया कि डाक टिकट किस प्रकार साहित्य, नैतिक मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के संवाहक बनते हैं। उन्होंने दूरदर्शन के लोकप्रिय गीत “एक चिड़िया, अनेक चिड़ियाँ…” का उल्लेख करते हुए भारत की “विविधता में एकता” की भावना को डाक टिकटों और भारतीय डाक विरासत से जोड़कर अत्यंत सहज ढंग से समझाया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विषयगत डाक टिकट अपने भीतर किसी युग, विचार, व्यक्तित्व या सांस्कृतिक कथा को संजोए रहता है।
उन्होंने घर-आंगन की परिचित गौरैया के तेजी से घटते अस्तित्व पर भी चिंता व्यक्त की। विद्यार्थियों को बताया कि तीव्र शहरीकरण, पारंपरिक घरों के स्थान पर कंक्रीट के भवन, कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग, घटते हरित क्षेत्र तथा प्रदूषण ने गौरैया के प्राकृतिक आवास और भोजन दोनों को प्रभावित किया है। उन्होंने बच्चों से आह्वान किया कि स्थानीय पौधे लगाकर, पक्षियों के लिए जलपात्र एवं दाना-पात्र रखकर तथा सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था कर जैव विविधता संरक्षण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि जैसे डाक टिकट हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हैं, वैसे ही प्रकृति और जीव-जंतुओं का संरक्षण भी प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है।
फिलाटेली ब्यूरो, शिमला के प्रभारी गौरव ने विद्यार्थियों को डाक विभाग द्वारा संचालित विभिन्न रचनात्मक एवं शैक्षिक गतिविधियों से अवगत कराया। उन्होंने ‘ढाई आखर पत्र लेखन प्रतियोगिता’, चित्रकला प्रतियोगिताओं, लोकप्रिय ‘माय स्टाम्प'”(my stem) कार्यक्रम तथा हिमाचल प्रदेश में विभिन्न ऐतिहासिक अवसरों, महापुरुषों और सांस्कृतिक धरोहरों पर जारी विशेष आवरणों (स्पेशल कवर) की जानकारी दी। उन्होंने विद्यार्थियों को इन गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि फलैटेली केवल संग्रह का शौक नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास, रचनात्मक अभिव्यक्ति, शोध प्रवृत्ति और राष्ट्रीय विरासत से जुड़ने का सशक्त माध्यम है।
संवादात्मक सत्र आगे बढ़ने के साथ ही पूरा सभागार बाल-मन की सहज जिज्ञासा, किशोर उत्साह और सीखने के उल्लास से जीवंत हो उठा। वक्ताओं का हर प्रश्न मानो बच्चों के भीतर छिपे ज्ञान और जिज्ञासा के झरनों को फूट पड़ने का निमंत्रण दे रहा था। उत्तर देने के लिए दर्जनों नन्हे हाथ एक साथ हवा में लहराने लगते और कई विद्यार्थी तो अपने स्थान से ही उत्साह में मानो कुलांचे भरते हुए स्वयं को अभिव्यक्त करने को आतुर दिखाई देते। सही उत्तर पर जब उनके हाथों में हिमाचल के राजकीय पक्षी हिमालयन मोनाल, सुख भद्र शिव तथा अन्य आकर्षक चित्र पोस्टकार्ड स्मृति-चिह्न के रूप में पहुंचे, तो उनकी आंखों की चमक और चेहरे की निष्कलुष मुस्कान बता रही थी कि जिज्ञासा को मिला सम्मान ही सीखने का सबसे बड़ा पुरस्कार है। उस क्षण डाक टिकट और चित्र पोस्टकार्ड केवल संग्रहणीय वस्तुएँ नहीं रहे, बल्कि बाल-मन की कल्पनाओं, ज्ञान-पिपासा और भारत की सांस्कृतिक विरासत के बीच एक आत्मीय सेतु बन गए।यह संस्करण केवल घटना का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस क्षण की अनुभूति, बच्चों की ऊर्जा और फिलाटेली के प्रति जागी आत्मीयता को भी सजीव कर देता है।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि फिलाटेली केवल डाक टिकट संग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के इतिहास, साहित्य, कला, पर्यावरण, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को समझने की एक सजीव पाठशाला है। यह शौक बच्चों में अध्ययनशीलता, अवलोकन क्षमता, सृजनात्मकता, धैर्य और राष्ट्रबोध जैसे गुणों का विकास करता है तथा उन्हें अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के प्रति संवेदनशील नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।