आंदोलनकारियों की पुकार: “हमें बिजली नहीं, भविष्य चाहिए”

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश टीम

पहाड़ रो रहे हैं, और हम बिजली गिन रहे हैं।”यह वाक्य लाहौल के एक वृद्ध किसान के मुंह से तब निकला जब उन्होंने अपने खेत के किनारे टूटते पहाड़ों को देखा — उस पहाड़ को जो कभी उनके देवता का निवास था।चेनाब नदी — जिसे इसके ऊपरी भागों में *चंद्रभागा* कहा जाता है — अब महज एक नदी नहीं रही, बल्कि यह एक युद्धक्षेत्र है: विकास और विनाश के बीच, विज्ञान और अनुभव के बीच, और सबसे दुखद — मनुष्य और प्रकृति के बीच।

हिमालय नीति अभियान के कार्यकर्ता गुमान सिंह का कहना है कि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की पर्वत श्रंखलाओं से निकलती चंद्रभागा पर वर्तमान में सबसे अधिक जलविद्युत परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं, निर्माणाधीन हैं या प्रस्तावित हैं। सरकारें इसे “ऊर्जा क्रांति” का प्रतीक बता रही हैं, लेकिन इससे *नदी की पारिस्थितिकी, स्थानीय जीवन-शैली और सांस्कृतिक पहचान* के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग चुका है।
इन परियोजनाओं में से कई *भूस्खलन, ग्लेशियर झील विस्फोट (GLOF)* और हिमस्खलन की दृष्टि से अति-जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। *प्रभाव आकलन रिपोर्टें* जलवायु जोखिमों पर चुप हैं, और *जन-सुनवाइयाँ* या तो होती नहीं, या कागज़ी औपचारिकता मात्र बन चुकी हैं।

चिनाब-चंद्रभागा घाटी पर बांधों का दबाव

गत दिवस लाहौल के उदयपुर उपमंडल के पंचायत प्रतिनिधियों के नेतृत्व में लाहौल स्पीति एकता मंच के अध्यक्ष सुदर्शन जस्पा ने लाहौल घाटी के चिनाब बेसिन में प्रस्तावित करीब डेढ़ दर्जन बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका। इन परियोजनाओं में जिस्पा (300 मेगावाट), स्टेगरी (98 मेगावाट), चतरू (120 मेगावाट), मयार (120 मेगावाट), तांदी (104 मेगावाट), रस्केल (130 मेगावाट), सेली (400 मेगावाट), शांगलिंग (44 मेगावाट), तेलिंग (94 मेगावाट), बरदांग (126 मेगावाट) को म1क्रेट), टिंगरेट (90 मेगावाट), रहोली डुगली (420 मेगावाट), पुर्थी (300 मेगावाट), साच खास (260 मेगावाट) और डुग्गर (380 मेगावाट) शामिल हैं। इन परियोजनाओं से लाहौल घाटी का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहेगा।

आज हमें यह तय करना है:क्या हम चंद्रभागा को बिजली की नली मानेंगे — या *जीवित, सांस लेती हिमालयी आत्मा*, जो हमें जीवन देती है?क्योंकि अगर चंद्रभागा की चीखें हमने न सुनीं, तो कल हमारे पास गूंगी घाटियाँ और उजड़ी संस्कृतियाँ ही शेष बचेंगी।

फोटो इंटरनेट से ली गई है।

सुदर्शन जस्पा ने हाल ही में हिमाचल सरकार द्वारा तेलंगाना सरकार के साथ मयार (120 मेगावाट) और सेली (400 मेगावाट) परियोजनाओं के लिए हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह निर्णय अत्यधिक संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों, लांगहौल जलवायु, ई जनजातीय क्षेत्रों की पूरी तरह से अनदेखी करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इन परियोजनाओं के निर्माण से न केवल घाटी की उपजाऊ भूमि, जैव विविधता और लुप्तप्राय प्रजातियां नष्ट होंगी बल्कि लाहौल के निवासियों को भी जबरन विस्थापित किया जा सकता है, जो पहले से ही अत्यधिक भौगोलिक परिस्थितियों में रह रहे हैं।

उन्होंने किन्नौर और उत्तराखंड जैसे उदाहरण दिए, जहां बड़े पैमाने पर विस्फोट, सुरंग निर्माण और इसी तरह की बड़ी परियोजनाओं के लिए मलबा डंप करने से विनाशकारी भूस्खलन और बाढ़ आई है। 2013 उत्तराखंड आपदा के कारणों की जांच के लिए गठित डॉ. रवि चोपड़ा समिति ने इस त्रासदी के लिए बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को जिम्मेदार ठहराया था।

इसी प्रकार, 2009 में माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा गठित अभय शुक्ला समिति ने पर्यावरण विनाश का हवाला देते हुए 7,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी परियोजनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने भी इन परियोजनाओं को उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए अनुपयुक्त माना है।चेनाब घाटी में जलवायु परिवर्तन ने *हिमनदों को पीछे धकेल दिया है*, झरनों को सूखा दिया है और किसानों की सिंचाई व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। *2004-05 तक चिनाब बेसिन में 33% ग्लेशियर क्षेत्र सिकुड़ चुका था* — और तब से हालात और बिगड़े हैं।

लाहौल की एक बुज़ुर्ग महिला* रोते हुए कहती हैं,> “हमारे देवता हिम से जुड़े हैं। जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं और पहाड़ टूटते हैं, तो हमें लगता है जैसे देवता नाराज़ हैं… और हम बेघर।”

लाहौल घाटी की औसत ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 9,000 फीट है, जो अभय शुक्ला समिति द्वारा अनुशंसित सीमा से 2,000 फीट अधिक है। इसके अतिरिक्त, यह जिला भूकंपीय जोखिम क्षेत्र 4 और 5 के अंतर्गत आता है, जिससे यह भूकंप के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

हाल के वर्षों में, भीषण मौसम परिवर्तन के कारण मायार, जाहल्मा, शांशा, तोज़िंग और शाक्स जैसे कई क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आई है। इन जोखिमों को देखते हुए, यह आवश्यक है कि पूरी घाटी इन परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट हो।

इसके मद्देनजर 23 मई 2025 को प्रातः 11 बजे उदयपुर के मृकुला माता मंदिर प्रांगण में पंचायत प्रतिनिधियों के नेतृत्व में विशाल विरोध रैली आयोजित की जाएगी। उन्होंने लाहौल-स्पीति के सभी महिला समूहों, युवा संगठनों, सामाजिक समूहों और बुद्धिजीवियों से रैली में शामिल होने और घाटी के भविष्य के लिए अपनी आवाज उठाने का आग्रह किया है।

स्थानीय कार्यकर्ता *राजेश ठाकुर*, जो पिछले एक दशक से जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ संघर्षरत हैं, कहते हैं:> “सरकारें हमें पर्यावरण-विरोधी कहती हैं, लेकिन हम अपने जंगल, नदियाँ और आस्था बचा रहे हैं। जिन गांवों को उजाड़ा गया, वहां आज तक न पुनर्वास हुआ, न मुआवज़ा मिला।”जन आंदोलनों की मांग है कि पहले *समुदाय आधारित पर्यावरण मूल्यांकन*, *स्वतंत्र वैज्ञानिक समिति की समीक्षा*, और *जन-सुनवाई की पारदर्शी प्रक्रिया* अपनाई जाए।

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हिमालयी पारिस्थितिकी, संस्कृति और समुदायों के अस्तित्व पर संकटप्रेस कॉन्फ्रेंस में जिला परिषद सदस्य महिंदर सिंह, बीडीसी सदस्य शीला देवी और रीता ठाकुर, राकेश, और लक्ष्मण ठाकुर, दिनेश कुमार, हीराचंद, गोपाल गौड़, निर्मला, विकास जस्पा, खुशाल चंद, सुरेंद्रदासी और प्रेमवी ठाकुर समेत कई ग्राम प्रधान मौजूद थे।

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