
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने जिला ऊना की गगरेट तहसील में कथित रूप से बड़े पैमाने पर हो रही अवैध पेड़ कटाई और वन उपज की तस्करी के मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। न्यायालय ने वन मंडलाधिकारी (डीएफओ), ऊना को विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएसएलए), ऊना के सचिव को गगरेट वन जांच चौकी का समय-समय पर निरीक्षण कर स्वतंत्र स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया एवं न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने 8 मार्च, 2026 को प्राप्त एक शिकायत पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। शिकायत के साथ जीपीएस टैग युक्त ऐसे छायाचित्र संलग्न थे, जिनमें गगरेट क्षेत्र के जंगलों से कटे हुए पेड़ों से लदे छोटे और बड़े ट्रक दिखाई दे रहे थे। शिकायतकर्ता का कहना था कि संबंधित विभाग को पहले भी अवगत कराया गया, किंतु कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही नहीं, वीडियो बनाने वालों को ही प्राथमिकी दर्ज करने की कथित धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया।

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी आया कि उपायुक्त कार्यालय की ओर से सूचना दी गई है कि एक मोबाइल नंबर के उपयोगकर्ता तथा उससे जुड़े सोशल मीडिया पेज के प्रशासकों के विरुद्ध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत लोक अशांति फैलाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है।
रिकॉर्ड में यह भी स्वीकार किया गया कि हिमाचल-पंजाब सीमा पर राष्ट्रीय राजमार्ग-3 स्थित गगरेट वन जांच चौकी वन उपज के आवागमन का प्रमुख मार्ग है। जीपीएस टैग युक्त तस्वीरों में 28 फरवरी और 2 मार्च, 2026 की सुबह 5:18 बजे से 6:40 बजे के बीच कई वाहन इस मार्ग से गुजरते दिखाई दिए, जिन्हें होशियारपुर की लकड़ी मंडी के लिए वैध वन उपज ले जाने वाला बताया गया। विभाग के अनुसार 69 वाहनों के ट्रांजिट परमिट की जांच कर उन्हें आगे जाने दिया गया, जबकि रिकॉर्ड में यह भी स्वीकार किया गया कि 149 वाहन अवैध रूप से वन उपज के परिवहन में संलिप्त पाए गए। इनमें अकेले अंब रेंज में 102 वाहन अनधिकृत वन उपज ढोते पाए गए तथा देहरा वन मंडल ने अपने अधिकार क्षेत्र में 15 वाहनों को पकड़ा।

उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट विवरण नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि हिमाचल प्रदेश से वास्तव में कितनी वन उपज बाहर ले जाई जा रही है, वाहनों की वास्तविक आवाजाही कितनी है अथवा जिन वृक्ष प्रजातियों को वैध बताया जा रहा है, उनका तथ्यात्मक आधार क्या है। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई, 2026 निर्धारित की है।
यह मामला केवल गगरेट तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश में जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था और वन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। विगत वर्षों में अवैध पेड़ कटान और वन तस्करी के मामले समय-समय पर विधानसभा, मीडिया, सोशल मीडिया और जनमंचों पर लगातार उठते रहे हैं, किंतु अधिकांश प्रकरण कुछ समय बाद चर्चा से ओझल हो जाते हैं। वन विभाग के ईमानदार कर्मचारी होशियार सिंह की हत्या के मामले में भी व्यापक स्तर पर वन माफिया की भूमिका के आरोप लगे थे और उन्हें कथित रूप से पेड़ से लटकाकर मारने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद वन माफिया के विरुद्ध कठोर और नजीर बनने वाली कार्रवाई न होने की धारणा लगातार बनी रही। यही कारण है कि कानून के भय के अभाव का संदेश फैलता है और वन संपदा पर अवैध कटान का खतरा बार-बार सिर उठाता दिखाई देता है।