सीमा चौहान/भूमित ठाकुर
डिजिटल शोर के इस युग में, जहां बचपन स्क्रीन की चकाचौंध में कहीं सिमटता जा रहा है, वहां डॉ. रीना सिंह की “टॉय लाइब्रेरी” की कल्पना केवल एक पहल नहीं, बल्कि बचपन को उसकी मूल धड़कनों से पुनः जोड़ने का संवेदनशील प्रयास है। यह वह सेतु है, जहां मौन और किलकारियां एक ही धारा में बहते हुए सृजन के दो आयाम रचते हैं—एक चिंतन का, दूसरा आनंद का।

ग्राम परिवेश
11 अप्रैल 2026 को शिमला के सांगटी-संजौली क्षेत्र में “खिलौनेवाला” – टॉय लाइब्रेरी का शुभारंभ एक ऐसी सोच के रूप में हुआ, जो डिजिटल व्यस्तताओं के बीच बचपन की खोती सहजता को फिर से जीवंत करने का संकल्प लेकर आई है। उत्तर भारत में अपनी तरह की इस अनूठी पहल ने यह सिद्ध कर दिया है कि सृजन केवल पुस्तकों के पन्नों में ही नहीं, बल्कि खिलौनों की दुनिया में भी सांस लेता है।
इस अवसर पर 11 एवं 12 अप्रैल को 1 से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए खिलौनों, खेलों और पुस्तकों की प्रदर्शनी आयोजित की गई, जहां हर खिलौना केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सीखने, समझने और स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनकर उभरा।
“खिलौनेवाला” केवल एक लाइब्रेरी नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक संकल्प है, जिसका उद्देश्य बच्चों को मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर की निर्जीव स्क्रीन से दूर ले जाकर उन्हें स्पर्श, संवाद और अनुभव के जीवंत संसार से जोड़ना है। यहां उपलब्ध आयु-उपयुक्त खिलौने, शैक्षिक खेल और पुस्तकें बच्चों के भीतर छिपी रचनात्मकता, कल्पनाशीलता और सामाजिक समझ को सहजता से आकार देती हैं।

इस अभिनव पहल के पीछे सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्पित समूह है, जिसमें सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. रीना सिंह की दूरदृष्टि और संवेदनशील नेतृत्व विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है। कार्यक्रम का उद्घाटन राघवेंद्र सिंह (रघु दादा) द्वारा उनके द्वितीय जन्मदिवस के अवसर पर किया गया, जिन्हें इस पहल का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया गया—यह अपने आप में बचपन को केंद्र में रखने का एक प्रतीकात्मक और सार्थक संदेश है।
सांगटी, संजौली, मलयाणा और चम्याना सहित आसपास के क्षेत्रों से आए अभिभावकों, बच्चों और बुद्धिजीवियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति ने इस पहल को सामुदायिक समर्थन की मजबूत नींव प्रदान की। उपस्थित जनों ने इसे न केवल समयानुकूल, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में एक अत्यंत आवश्यक कदम बताया।
“खिलौनेवाला” दरअसल उस भूले हुए सच की पुनर्स्मृति है कि बचपन को विकसित करने के लिए केवल ज्ञान नहीं, अनुभव चाहिए—और अनुभव खिलौनों की उस दुनिया में सबसे सहजता से जन्म लेता है, जहां हर किलकारी एक नए सृजन की प्रस्तावना होती है।