केंद्रीय बजट 2026–27 ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की प्राथमिकताओं में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़—कृषि—लगातार हाशिये पर खिसकती जा रही है। किसानों की आय दोगुनी करने के दावे इस बजट में भी महज़ औपचारिक वक्तव्यों तक सीमित रह गए, जबकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि न तो कर्ज़ माफी पर कोई प्रस्ताव है और न ही खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे किसानों को ठोस राहत देने की कोई ठोस योजना।

वित्त मंत्री के बजट भाषण में कृषि का उल्लेख औपचारिकता भर तक सीमित रहा। छोटे और सीमांत किसानों का नाम मात्र एक बार लिया गया, जबकि ग्रामीण मज़दूर—जो कृषि व्यवस्था की रीढ़ हैं—पूरी तरह बजट वक्तव्य से गायब रहे। बजटीय आंकड़े इस उपेक्षा की पुष्टि करते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 स्वयं स्वीकार करता है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है। पिछली तिमाही में यह दर 3.5 प्रतिशत रही, जो पिछले एक दशक की औसत 4.45 प्रतिशत वृद्धि दर से काफी कम है। फसल उत्पादन में आई गिरावट और कृषि क्षेत्र में व्याप्त ठहराव की पृष्ठभूमि में यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि बजट 2026–27 किसानों को राहत और दिशा देगा, लेकिन बजट ने निराशा को और गहरा किया है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कुल बजटीय आवंटन लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये रखा गया है, जो संशोधित अनुमान 2025–26 की तुलना में केवल 5.3 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि है। महँगाई के वास्तविक प्रभाव को देखते हुए यह वृद्धि वस्तुतः ठहराव के समान है।

चिंताजनक तथ्य यह है कि जहाँ आर्थिक सर्वेक्षण अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों की उत्पादकता को वैश्विक औसत से काफी कम बताता है, वहीं कृषि अनुसंधान और विकास के लिए बजटीय सहयोग घटा दिया गया है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग का आवंटन 10,281 करोड़ रुपये (RE 2025–26) से घटाकर 9,967 करोड़ रुपये (BE 2026–27) कर दिया गया है, जो सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

नक़दी फसलों को लेकर बजट में बयानबाज़ी जारी रही। नारियल, कोको, काजू, नट्स और चंदन जैसे क्षेत्रों का उल्लेख तो किया गया, लेकिन कपास प्रौद्योगिकी मिशन, दलहन मिशन, हाइब्रिड बीज कार्यक्रम और मखाना बोर्ड जैसी पूर्वघोषित योजनाएँ बजटीय प्रावधानों में पूरी तरह नदारद रहीं।

किसानों को सीधी राहत देने वाले प्रावधानों में भी भारी कटौती की गई है। उर्वरक सब्सिडी को 1,86,460 करोड़ रुपये (RE 2025–26) से घटाकर 1,70,781 करोड़ रुपये (BE 2026–27) कर दिया गया है, यानी 15,679 करोड़ रुपये की सीधी कटौती। खाद्य सब्सिडी में भी संशोधित अनुमानों की तुलना में कमी की गई है।

ग्रामीण रोज़गार के मोर्चे पर स्थिति और भी चिंताजनक है। बजट भाषण में न तो मनरेगा का उल्लेख हुआ और न ही हाल में पारित VB-GRAMG योजना का। VB-GRAMG के लिए 95,692 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो केंद्र के 60 प्रतिशत हिस्से तक सीमित है, जबकि शेष 63,794 करोड़ रुपये से अधिक का बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है। यह संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है।

आर्थिक समीक्षा 2025–26 के अनुसार, अधिशेष राज्यों की संख्या 2018–19 में 19 से घटकर 2023–24 में केवल 11 रह गई है। इसके बावजूद 16वें वित्त आयोग ने राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की माँग को नज़रअंदाज़ करते हुए इसे 41 प्रतिशत तक सीमित रखा है। इससे राज्य सरकारें रोज़गार गारंटी जैसी योजनाओं के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में असमर्थ होंगी और ग्रामीण जनता को पहले मनरेगा के तहत मिलने वाले औसतन 47 दिनों के रोज़गार की गारंटी भी संकट में पड़ जाएगी।

ग्रामीण रोज़गार से जुड़ी एकमात्र घोषणा महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना की रही, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वित्तीय प्रावधान नहीं किया गया। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में केवल पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में मामूली वृद्धि देखने को मिली है, जहाँ आवंटन 5,303 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 6,135 करोड़ रुपये किया गया है, पर यहाँ भी सार्वजनिक ढांचे के बजाय ऋण-आधारित विस्तार और निजी निवेश पर अधिक ज़ोर है : AIKS,HKS

इन परिस्थितियों में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) और हिमाचल किसान सभा (HKS) ने किसानों, ग्रामीण मज़दूरों और आम जनता से आह्वान किया है कि वे इस किसान-विरोधी, मज़दूर-विरोधी और संघवाद-विरोधी केंद्रीय बजट 2026–27 के ख़िलाफ़ 3 फ़रवरी 2026 को देशभर में गाँवों और तहसीलों में बजट की प्रतियाँ जलाकर विरोध दर्ज करें। साथ ही 12 फ़रवरी 2026 की आम हड़ताल को सफल बनाकर जनविरोधी बजट के ख़िलाफ़ जनआक्रोश को संगठित रूप से व्यक्त करने की अपील की गई है।

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