
लाल सी टीन दिखाई दे रही है वह बागवान का घर है और सफेद नेट वाला उसका बगीचा दोनों मिट्टी में मिल गए ।
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
हिमाचल की धरती आज कराह रही है। नदियां उफान पर हैं, पहाड़ दरक रहे हैं, गांव-गांव उजड़ रहे हैं, और किसान-बागबान अपनी जिंदगी की नींव बहते देख रहे हैं। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, पशुशालाएं और मकान… सबकुछ मलबे में दबा पड़ा है। यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक प्रलय है जिसने हजारों घरों की चूल्हा-चौकी बुझा दी है।
परंतु इस प्रलय से भी बड़ी त्रासदी यह है कि हिमाचल के ही 25 भाजपा विधायक, 7 सांसद और राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा—जो इसी मिट्टी की कोख से निकले हैं—आज मौन साधे बैठे हैं। जिनके कंधों पर लोकधर्म निभाने की जिम्मेदारी थी, वे संकीर्ण राजनीति की कुटिल बिसात पर हिमाचल की पीड़ा को गिरवी रख रख रहे हैं। दिल्ली दरबार से हिमाचल को राहत और सहयोग मिलना चाहिए था, पर सत्ता की गणित वहां अधिक भारी पड़ी और हिमाचल का दर्द हल्का साबित हो रहा है।
सोचने वाली बात है कि जब अपने ही जनप्रतिनिधि अपनी मातृभूमि की कराह को अनसुना कर दें, तो फिर जनता किससे उम्मीद करे? यह मौन, यह संवेदनहीनता, हिमाचल के विश्वास के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है। प्रकृति ने भले पहाड़ तोड़े हों, पर जनप्रतिनिधियों की यह चुप्पी हिमाचल की आत्मा को तोड़ रही है।
विडम्बना यह भी है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र के बाद भी इन जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं नहीं जागीं। वे आज भी केंद्र से मिलने वाली नियमित राहत राशि, योजनाओं और ग्रांट के आंकड़े गिनाने में ही मशगूल हैं—मानो इस प्रलय की विभीषिका महज़ अखबारों की काली लाल सुर्खियां और विधानसभा की रिपोर्ट में सिमट सकतीं हो।
बीते आठ दिनों तक चले विधानसभा सत्र में 59 घंटे की बहसों और प्रश्नोत्तर में भाजपा विधायक केवल अपने क्षेत्रों की तबाही गिनाते और मौजूदा सरकार पर दोषारोपण करते रहे। परंतु एक बार भी उन्होंने हिमाचल को भरोसा नहीं दिलाया कि वे स्वयं प्रधानमंत्री से विशेष राहत पैकेज लेकर आएंगे। जनता के दर्द को शब्दों में उछालना आसान रहा, पर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने का संकल्प कहीं नहीं दिखा। हां, सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित जरूर हुआ, लेकिन उसमें वह जीवनदायिनी प्राणवायु नहीं थी जिसकी जनता को दरकार थी।
इसी बीच भाजपा के एक राज्यसभा सांसद का वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि “सुक्खू सरकार अगले दो वर्षों में एक पत्थर भी नहीं लगा पाएगी, यह मैं गारंटी देता हूं।” यह बयान हिमाचल की त्रासदी के बीच सत्ता के मद में मदांध मानसिकता का वीभत्स प्रदर्शन था। इसने भाजपा सांसदों, विधायकों और धरतीपुत्र कहलाने वाले जे.पी. नड्डा की वास्तविक मंशा को उजागर कर दिया—कि वे हिमाचल की आपदा को जनकल्याण की दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसरवाद की दृष्टि से देख रहे हैं।
जनता के सपने मलबे के नीचे दबे हैं और जनप्रतिनिधि चुनावी समीकरण गिन रहे हैं। यही वह सबसे बड़ा अन्याय है, जिसने हिमाचल के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उसमें नमक छिड़कने का काम किया है।