मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश

भ्रम-काल के एक दशक तक झूलों की कूटनीति, आलिंगनों की तस्वीरें और सम्मानों की मालाओं में गढ़ी गई ‘विश्वगुरु’ कथा— गलवान घाटी का संघर्ष , सीमाओं की सरकती रेखाओं और ‘ऑपरेशन सिंदूर विराम की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा, एक तरफी ट्रेड डील, क्रूड आयल खरीद के हुक्म के बाद खाड़ी के तनावपूर्ण परिदृश्य तथा हिंद महासागर में संयुक्त अभियान के दौरान बुलाए गए ईरानी युद्धपोत को अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा मार गिराए जाने की घटना ने उस कथा की चमक को अचानक धुंधला कर दिया है। वैश्विक मंच पर पसरी यह तन्हाई भारतीयों को मानो भ्रम के उत्सव से उठाकर कठोर बोध-काल की दहलीज़ पर ला खड़ा कर रही है, जहां तस्वीरों की कूटनीति और वास्तविक शक्ति-संतुलन के बीच का अंतर साफ़ दिखाई देने लगता है।

यही वह क्षण है जब राष्ट्र अपने नेतृत्व की कूटनीतिक दृढ़ता को नए सिरे से परखने लगता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मित्रताओं की चमक जब यथार्थ की कठोर रोशनी में बदलती है, तब शब्दों और मौन—दोनों का अर्थ बदल जाता है। और ठीक इसी मोड़ पर हाल के दिनों में अमेरिकी नेतृत्व की भाषा तथा उस पर भारतीय सत्ता की चुप्पी ने जनमानस में उठते प्रश्नों को और तीखा कर दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और उनके प्रशासकीय सहयोगियों की तुगलकी फरमान जैसी टिप्पणियां तथा भारत के प्रति की गई अमर्यादित भाषा पर देश के शासकीय नेतृत्व का यह लंबा खिंचा मौन आज हर आत्मसम्मानी भारतीय के मन में असहज प्रश्नों का तूफ़ान खड़ा कर रहा है। राष्ट्र सोचने को विवश है—क्या यह वही भारत है जो विश्व मंचों पर स्वाभिमान की भाषा बोलने का दावा करता है, या फिर कूटनीति के नाम पर अपमान को भी निगल जाने की आदत पाल चुका है?

विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति का नाम बार-बार कुख्यात Jeffrey Epstein files की परछाइयों से उछलता दिखाई देता है, उसी के व्यंग्य और अवमाननाओं पर यहां की सत्ता का मौन कुछ अधिक ही गूढ़ प्रतीत होता है। जनमानस के भीतर कटु प्रश्न उभर रहे हैं—क्या हम ट्रम्प के कथनों के सामने सिर झुकाए खड़े हैं, या फिर हमारा नेतृत्व अपनी ही किसी संवेदनशील फाइल की धूल उड़ने के भय से होंठ सिए बैठा है?

कूटनीति की इस खामोशी ने मानो “मौन स्वीकृति” का एक अंतहीन धारावाहिक रच दिया है, जिसमें हर दिन नया प्रकरण जुड़ता है और स्वाभिमान का प्रश्न अगले दृश्य तक टाल दिया जाता है। परिणाम यह कि जनता की स्मृति में आज यह सवाल और तीखा होकर उभर रहा है—राष्ट्र की गरिमा की रक्षा में शब्दों का साहस कब जागेगा, या मौन ही नई कूटनीति का स्थायी सूत्र बन चुका है?
कारण कोई भी हो, सूत्र जो भी हो—हर आत्मसम्मानी भारतीय अपने-अपने ढंग से सत्ता की ओर उंगली उठा रहा है; संदेह की एक महीन परत जनमानस पर छा रही है और भीतर कहीं एक अनकहा संकोच भी जन्म ले रहा है, मानो राष्ट्र की अस्मिता पर पड़ी चोटों और खरोंचों की पीड़ा नागरिकों के मन-मस्तिष्क को भीतर तक विदारित कर रही हो।

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