मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश

हिमाचल प्रदेश के साथ केंद्र सरकार के वित्तीय व्यवहार को लेकर चिंताजनक संकेत लगातार गहराते जा रहे हैं। चाहे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन (एनडीएमए/एनडीआरएफ) के तहत आपदा राहत की राशि हो, राज्य की कर्ज़ लेने की सीमा में ढील का प्रश्न हो, जीएसटी मुआवज़ा एवं अनुदान हो या फिर विशेष श्रेणी राज्यों को सहारा देने वाली आरडीजी ग्रांट—हर मोर्चे पर केंद्र सरकार की मुठ्ठी कसती दिखाई दे रही है। बजट 2026–27 में आरडीजी ग्रांट का पूर्णत: लोप हो जाना इस सख्त रुख की परिणति के रूप में सामने आया है, जिससे पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे हिमाचल की वित्तीय सांस और संकुचित हो गई है। यह स्थिति न केवल संघीय सहयोग की भावना पर प्रश्न खड़े करती है, बल्कि छोटे और पर्वतीय राज्यों की विकासात्मक क्षमताओं को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।

इसी पृष्ठभूमि में 16वें वित्तायोग की सिफारिशों ने हिमाचल प्रदेश समेत छोटे राज्यों की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया है। 16वें वित्तायोग ने हिमाचल को आरडीजी ग्रांट देने की अनुशंसा नहीं की, जिसके चलते राज्य को अनुमानित रूप से लगभग 40 हजार करोड़ रुपये का भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ेगा। आरडीजी ग्रांट के बंद हो जाने से हिमाचल सहित सभी छोटे राज्यों के समक्ष एक विकट आर्थिक परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। उल्लेखनीय है कि 15वें वित्तायोग के कार्यकाल में हिमाचल प्रदेश को आरडीजी ग्रांट के रूप में 35 से 40 हजार करोड़ रुपये की सहायता मिली थी, जिसने सीमित संसाधनों वाले राज्य को विकास, आधारभूत ढांचे और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में महत्वपूर्ण संबल प्रदान किया था।

आज जब वह सहारा समाप्त कर दिया गया है, तब यह सवाल और अधिक मुखर होकर सामने आता है कि क्या केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में संतुलन और संवेदनशीलता की जगह कठोरता और उपेक्षा लेती जा रही है—और क्या इसका बोझ अंततः छोटे राज्यों की जनता को उठाना पड़ेगा।

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