
ज्ञान ठाकुर/मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
केंद्र द्वारा 1 फरवरी 2026 से राजस्व घाटा अनुदान (RDG) की समाप्ति ने हिमाचल की वित्तीय संरचना को गहरे असंतुलन में धकेलते हुए लगभग ₹8,500 से ₹10,500 करोड़ की वार्षिक क्षति का दबाव निर्मित किया है, जिसके प्रतिफलस्वरूप मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वर्ष 2026-27 के लिए ₹54,298 करोड़ का अपेक्षाकृत संकुचित और युक्तिसंगत बजट प्रस्तुत किया। वैश्विक आर्थिक मंदी के संकेत, पश्चिम एशिया के तनाव, बढ़ती महंगाई और ईंधन मूल्यों के दबाव के बीच राज्य की अनुमानित राजस्व प्राप्तियां ₹40,361 करोड़ और व्यय ₹46,938 करोड़ रहने से ₹6,577 करोड़ का राजस्व घाटा तथा ₹9,698 करोड़ का राजकोषीय घाटा उभरता है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 3.94 प्रतिशत है—एक ऐसा परिदृश्य जो वित्तीय अनुशासन और दूरदर्शिता की कसौटी को और कठोर बना देता है।
इस वित्तीय संकुचन के बीच सरकार ने एक ओर जहां पुरानी पेंशन योजना (OPS) और सामाजिक सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को अक्षुण्ण रखने का संकल्प दोहराया, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री से लेकर प्रशासनिक ढांचे के शीर्ष अधिकारियों तक 20 से 50 प्रतिशत वेतन को छह माह के लिए स्थगित कर सामूहिक उत्तरदायित्व का संकेत दिया है, ताकि राज्य की वित्तीय संतुलन-रेखा बनी रहे और जनसेवाएं निर्बाध चलती रहें। 47,400 करोड़ के विरासत कर्ज, जीएसटी से अनुमानित ₹25,000 करोड़ के नुकसान, और पहाड़ी राज्य की विकासगत सीमाओं के बीच यह बजट एक ओर राजकोषीय विवेक का दस्तावेज बनकर उभरता है, तो दूसरी ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के माध्यम से आर्थिक प्रवाह को जीवित रखने का जीवनदायिनी प्रयास भी सिद्ध होता है।
इसी संतुलनकारी दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री ने अपने लगातार चौथे बजट में स्पष्ट किया कि सीमित संसाधनों के बीच व्यय की प्राथमिकताओं को पुनर्संरचित करना समय की मांग है—जहां हर 100 रुपये में 27 रुपये वेतन, 21 रुपये पेंशन, 13 रुपये ब्याज अदायगी और 9 रुपये ऋण भुगतान में समाहित हो जाते हैं, वहीं मात्र 20 रुपये ही विकासात्मक गतिविधियों के लिए शेष बचते हैं। यही कारण है कि वेतन स्थगन को अस्थायी लेकिन आवश्यक औजार के रूप में प्रस्तुत करते हुए शासन-तंत्र में साझा उत्तरदायित्व की भावना जगाने का प्रयास किया गया है, जिसमें उच्च न्यायालय सहित सभी संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं से भी सहयोग का आग्रह निहित है।
इसके समानांतर, बजट की अंतर्धारा सामाजिक संवेदनशीलता और ग्रामीण पुनरोद्धार की ओर प्रवाहित होती दिखाई देती है। एक ओर पेंशनरों के लंबित एरियर के भुगतान, अनुबंध कर्मियों के नियमितीकरण, दिहाड़ी व आउटसोर्स कर्मियों के वेतन संवर्द्धन और आंगनबाड़ी, आशा वर्करों सहित जमीनी कार्यबल के मानदेय में 500-500 रुपए की वृद्धि जैसे कदम सामाजिक सुरक्षा के दायरे को सुदृढ़ करते हैं; वहीं दूसरी ओर दूध, गेहूं, मक्का, जौ, हल्दी और अदरक जैसे उत्पादों के समर्थन मूल्यों में 10 रुपए से लेकर 60 रुपए की वृद्धि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति का संचार करती है। “मुख्यमंत्री अपना सुखी परिवार योजना” के तहत एक लाख परिवारों को राहत, महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण, और 300 यूनिट मुफ्त बिजली जैसी पहलें इस बजट को जनोन्मुखी आधार प्रदान करती हैं।
विकास के आयामों को भी संतुलित ढंग से साधने का प्रयास किया गया है—चौबीसों घंटे बाजार संचालन से पर्यटन और स्थानीय आर्थिकी को गति देने की पहल, शिक्षा क्षेत्र में सीबीएसई संबद्धता का विस्तार और समकक्ष सुविधाओं का प्रावधान, महिलाओं के लिए स्टाम्प ड्यूटी में राहत, नई टाउनशिपों का विकास, युवाओं को नशे से दूर रखने के अभियान, शिमला में 24 घंटे पेयजल आपूर्ति और पुलिस बल में भर्ती जैसे कदम बुनियादी ढांचे और सामाजिक संरचना दोनों को समानांतर रूप से सुदृढ़ करने की दिशा में संकेत देते हैं।
समग्रतः यह बजट केवल आंकड़ों का संतुलन नहीं, बल्कि संसाधनों की सीमाओं के भीतर संवेदनशील शासन की एक ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जिसमें वित्तीय अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और ग्रामीण पुनर्जीवन—तीनों एक साथ संतुलित होते दिखाई देते हैं।
इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट होता है कि सरकार की नीतिगत दृष्टि केवल वित्तीय संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संवेदनशीलता और संबल के विस्तार के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक सुरक्षा और अवसर की पहुँच सुनिश्चित करने का प्रयास भी कर रही है। गंभीर वित्तीय दबाव के बावजूद वर्ष 2016 से पूर्व के पेंशनरों और पारिवारिक पेंशनरों को लंबित एरियर का पूर्ण भुगतान सुनिश्चित करने का संकल्प, अनुबंध कर्मियों के लिए चरणबद्ध नियमितीकरण का स्पष्ट रोडमैप, तथा दिहाड़ी और आउटसोर्स कर्मियों के वेतन में वृद्धि—ये सभी कदम शासन की उत्तरदायित्वपूर्ण प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं।
मुख्यमंत्री अपना सुखी परिवार योजना” के विस्तार, 300 यूनिट मुफ्त बिजली और महिलाओं को मासिक आर्थिक सहयोग जैसी पहलों से सामाजिक सुरक्षा का दायरा और व्यापक होता है, तो दूसरी ओर 24×7 बाजार संचालन, शिक्षा क्षेत्र में संस्थागत विस्तार, महिलाओं के लिए स्टाम्प ड्यूटी में राहत, नई टाउनशिपों का विकास तथा “खेलो हिमाचल—चिट्टा मुक्त हिमाचल” जैसे अभियानों के माध्यम से विकास को बहुआयामी गति देने का प्रयास भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
Good efforts despite all efforts to weaken his government .