
मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ग्राम परिवेश
शिमला की बची-खुची प्राइम प्रॉपर्टियों में शुमार, ए.जी.ऑफिस (गार्डन कैसल) के समीप स्थित ब्रह्मो समाज मंदिर की ऐतिहासिक संपत्ति—आज केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि शहर की आत्मा का जीवंत दस्तावेज है। चौड़ा मैदान से लेकर इस परिसर तक का विस्तार, जहाँ देवदार के घने जंगल और ब्रिटिशकालीन स्थापत्य,( कला, विज्ञान और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का ऐसा समन्वय है), अपनी मौन गरिमा में इतिहास के पन्ने खोलते हैं, वहीं यह क्षेत्र आज रसूखदार हितों की टकराहट का अखाड़ा बनता जा रहा है। विरासत की इस अनमोल धरोहर पर कब्जे की अदृश्य लड़ाई अब सड़कों से निकलकर पुलिस, अदालत और अंततः हाईकोर्ट की चौखट तक पहुँच चुकी है—जहाँ न्यायपालिका ने इस प्रकरण को महज संपत्ति विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था और जवाबदेही की कसौटी के रूप में देखा है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग से इनकार करते हुए न्यायालय की निगरानी की मांग नहीं कर सकते। मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने क्रिमिनल रिट याचिका संख्या 23/2024 एवं संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान पुलिस थाना वेस्ट शिमला में दर्ज विभिन्न एफआईआर की स्थिति की गहन समीक्षा की।
अदालत के समक्ष यह तथ्य उभरा कि एफआईआर संख्या 212 और 215 (2024) अभी जांचाधीन हैं, जबकि एफआईआर संख्या 204 और 205 में चालान प्रस्तुत किए जा चुके हैं। वहीं, एफआईआर संख्या 207 में प्रथमदृष्टया साक्ष्यों के अभाव में निरस्तीकरण रिपोर्ट दायर की गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता ललित वर्मा द्वारा बीएनएसएस की धारा 94 के तहत जारी नोटिस के बावजूद मूल ट्रस्ट डीड और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत न करने को गंभीरता से लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच में असहयोग न केवल प्रक्रिया को बाधित करता है, बल्कि न्यायिक निगरानी की मांग को भी कमजोर करता है।
याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा भविष्य में सहयोग का आश्वासन दिए जाने पर अदालत ने निर्देश दिया कि सभी आवश्यक दस्तावेज जांच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं। साथ ही, दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए आवश्यक होने पर न्यायालय से अनुमति लेने की बात भी कही गई।
यह मामला ब्रह्मो समाज के अनुयायियों द्वारा शांतिपूर्ण प्रार्थना के दौरान हुए कथित विवाद से जुड़ा है, जिसमें कुछ लोगों के घायल होने की सूचना है। आरोप है कि रामकृष्ण मिशन से जुड़े बताए जा रहे स्वामी तनमहिमानंद और रूपानंद ने घटना को भड़काने में भूमिका निभाई।
पूरे प्रकरण में कुल पांच एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें से दो में चालान पेश हो चुका है, एक में निरस्तीकरण रिपोर्ट दायर की गई है, जिसे याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है और पुलिस जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
हालांकि, पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि याचिकाकर्ता स्वयं जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे थे। विशेष रूप से ललित वर्मा को आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किया गया था, जिसका अनुपालन न होने पर मजिस्ट्रेट के माध्यम से आगे की कार्रवाई करनी पड़ी।
अदालत ने हिमालय ब्रह्मो समाज ट्रस्ट को, मोहनदेर कुमार के माध्यम से, प्रतिवादी संख्या 14 के रूप में शामिल करते हुए ट्रस्ट का पक्ष रिकॉर्ड पर लिया है।
अब इस संवेदनशील और बहुस्तरीय विवाद की अगली सुनवाई 24 मई 2026 को निर्धारित की गई है, जिस पर शहर की विरासत, वैधानिकता और जवाबदेही—तीनों की कसौटी टिकी हुई है।