AI- एआई द्वारा तैयार किया गया है चित्र

मोहिंद्र प्रताप सिंह राणा/ ग्राम परिवेश 

पंचायत चुनाव के रोस्टर की घोषणा होते ही प्रदेश के हर चौंक-चौराहे, चूल्हे-चौंके, हाट-दुकान—यहां तक कि मिट्टी का हर कण राजनीतिक ऊर्जा से संचारित हो उठा है। मानो प्रजातंत्र के इस पर्व का शुभारंभ हो गया हो—और हो भी क्यों न? वास्तव में पंचायत ही तो प्रजातंत्र और प्रतिनिधित्व की नींव है। यदि यह नींव मजबूत है, तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक प्रकाश-पुंज बनकर समूचे विश्व को आलोकित करता रहेगा।

लेकिन क्या यह सच है कि प्रजातंत्र की यह नींव वास्तव में मजबूत है? क्या लोग इसकी मजबूती के लिए वोट देने के अलावा भी अपना दायित्व निभा रहे हैं? पूर्व के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ऐसा कहना कठिन है। विडंबना यह है कि जो लोग आज ऊर्जा से ओत-प्रोत दिखाई दे रहे हैं, वही ग्राम सभाओं—जो इस मजबूत नींव की ईंट-गारा हैं—की बैठकों में घोर उदासीनता दिखाते हैं। बैठकों का कोरम झूठे हस्ताक्षरों की गिनती पर टिकाया जा रहा है और प्रधानों को भ्रष्टाचार के लिए खुला छोड़ दिया जाता है। इस तथ्य का खुलासा वर्ष 2024-25 के सामाजिक अंकेक्षण में हुआ है।

अंकेक्षण रिपोर्ट की टिप्पणियां और आपत्तियां भयावह हैं। रिपोर्ट की विस्तृत चर्चा अगले अंक में करेंगे; आज हम सामाजिक अंकेक्षण की महत्ता को समझते हैं—जानते हैं कि सामाजिक अंकेक्षण क्या होता है और इसकी बैठकों में भाग लेना क्यों आवश्यक है?

 हिमाचल प्रदेश में मनरेगा के तहत सामाजिक अंकेक्षण की सातवीं वार्षिक रिपोर्ट पारदर्शिता और जवाबदेही की ठोस तस्वीर पेश करती है।  वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान प्रदेश के 12 जिलों में सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया ने व्यापक विस्तार लिया। प्रथम चरण में निर्धारित 3615 ग्राम पंचायतों में से 3606 में अंकेक्षण संपन्न किया गया, जबकि द्वितीय चरण में निर्धारित 3535 ग्राम पंचायतों के मुकाबले 3232 पंचायतों में यह प्रक्रिया पूरी की गई। यह आंकड़े न केवल प्रशासनिक सक्रियता को दर्शाते हैं, बल्कि जमीनी स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की सशक्त प्रतिबद्धता को भी उजागर करते हैं।    

 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन राष्ट्र की नीतियों के केंद्र में रहे हैं। 2 अक्टूबर 1952 को प्रारंभ किया गया सामुदायिक विकास कार्यक्रम केवल योजनाओं का समूह नहीं, बल्कि ग्राम स्वावलंबन की एक दूरदर्शी परिकल्पना थी, जिसमें जनभागीदारी को विकास का मूल आधार बनाया गया। इसी दृष्टि को साकार करने हेतु सामुदायिक विकास खंडों की स्थापना की गई, जो ग्रामीण योजनाओं के नियोजन और क्रियान्वयन के धुरी बने।

समय के साथ यह दृष्टि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से और सुदृढ़ हुई—मनरेगा ने रोजगार की गारंटी देकर आजीविका को स्थायित्व दिया, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण ने पक्के घरों का संबल प्रदान किया, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने स्वयं सहायता समूहों के जरिए आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया, स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण ने स्वच्छता को जीवनशैली बनाया, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना ने युवाओं को कौशल व रोजगार से जोड़ा, और सांसद आदर्श ग्राम योजना ने समग्र ग्राम विकास की दिशा तय की। ये सभी पहल मिलकर ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर, सशक्त और गरिमामय बनाने की सशक्त आधारशिला बन रही हैं।

सामाजिक अंकेक्षण एक सतत, जनभागीदारी आधारित प्रक्रिया है, जो योजनाओं के प्रारूपण से लेकर क्रियान्वयन और मूल्यांकन तक जनता को केंद्र में रखती है। इसका मूल उद्देश्य विकास संसाधनों के उपयोग पर पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी सुनिश्चित करना है, ताकि भ्रष्टाचार और रिसाव पर अंकुश लगे। यह प्रक्रिया न केवल लाभार्थियों को सशक्त बनाती है, बल्कि उन्हें निर्णय और मूल्यांकन में भागीदार बनाकर जनविश्वास को सुदृढ़ करती है। साथ ही, यह क्रियान्वयन एजेंसियों को समय पर सुधार का अवसर देती है और संसाधनों के प्रभावी, न्यायसंगत व सतत उपयोग की दिशा में मार्ग प्रशस्त करती है।

सामाजिक अंकेक्षण का मूल उद्देश्य योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना, संसाधनों के वास्तविक उपयोग की जमीनी सच्चाई उजागर करना, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर अंकुश लगाना तथा यह परखना है कि खर्च किया गया धन आम लोगों के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है या नहीं।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तहत सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाते हुए ग्राम सभा को योजनाओं की निगरानी और समीक्षा का अधिकार दिया गया है, जहां सभी अभिलेखों की पारदर्शी जांच सुनिश्चित होती है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और जनजागरूकता को सुदृढ़ कर लोगों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है। यह व्यवस्था योजनाओं के केवल व्यय नहीं, बल्कि उनके वास्तविक प्रभाव और जनहित में उपयोगिता का समग्र मूल्यांकन सुनिश्चित करती है।

कार्यप्रणाली

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा निर्धारित प्रारूपों के आधार पर सामाजिक अंकेक्षण एक सुव्यवस्थित और चरणबद्ध प्रक्रिया के रूप में संपन्न किया जाता है। इसके अंतर्गत ब्लॉक एवं ग्राम स्तर के संसाधन व्यक्तियों की टीम ग्राम पंचायत का दौरा कर समस्त अभिलेख—जॉब कार्ड, मस्टर रोल, कार्य रजिस्टर, स्वीकृति आदेश, मापन पुस्तिकाएं, भुगतान विवरण, सामग्री बिल, परिसंपत्ति रजिस्टर एवं पूर्व अंकेक्षण रिपोर्ट आदि—संग्रहित एवं सत्यापित करती है।

ग्राम सभा से पूर्व इन अभिलेखों को विधिवत संकलित कर निर्धारित प्रारूपों में उपलब्ध कराया जाता है, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। टीम लाभार्थियों, पंचायत प्रतिनिधियों एवं संबंधित अधिकारियों से संवाद कर जमीनी तथ्यों की पुष्टि करती है, कार्य स्थलों का निरीक्षण कर माप एवं गुणवत्ता का आकलन करती है तथा अनुमानों से वास्तविकता का तुलनात्मक विश्लेषण कर संभावित विचलनों को चिन्हित करती है। इस प्रकार यह प्रक्रिया दस्तावेजी सत्यापन और जमीनी हकीकत के समन्वय से वास्तविक स्थिति को उजागर करती है।

प्रक्रिया

सामाजिक अंकेक्षण एक सुनियोजित और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत संपन्न किया जाता है, जिसकी शुरुआत सोशल ऑडिट कैलेंडर को एमआईएस पर अपलोड करने से होती है। इसके पश्चात निर्धारित तिथियों पर अंकेक्षण टीम ग्राम पंचायत का दौरा कर अभिलेखों का सत्यापन करती है और रजिस्टरों में दर्ज आंकड़ों का एमआईएस से मिलान कर वास्तविकता की पड़ताल करती है।

इसके साथ ही मनरेगा के अंतर्गत निर्मित परिसंपत्तियों का भौतिक निरीक्षण समुदाय की सहभागिता से किया जाता है, जहां माप और गुणवत्ता का आकलन कर संभावित विचलनों को चिन्हित किया जाता है। घर-घर जाकर जॉब कार्ड की जांच के माध्यम से रोजगार, मजदूरी भुगतान एवं विलंब जैसी वास्तविकताओं को परखा जाता है।

सामुदायिक जागरूकता के लिए विभिन्न समूहों के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें ग्राम सभा में भागीदारी हेतु प्रेरित किया जाता है, जहां उनकी समस्याएं और सुझाव सामने आते हैं। अंततः, संकलित तथ्यों के आधार पर प्रारूप सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट तैयार कर ग्राम सभा के समक्ष सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की जाती है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही को सुदृढ़ आधार मिलता है।

सामाजिक अंकेक्षण में चुनौतियां और समाधान

सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया, जितनी सशक्त और जनोन्मुखी है, उतनी ही जमीनी स्तर पर विविध भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण जटिल भी है। यदि इन चुनौतियों का समय रहते समाधान न किया जाए, तो पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन ही नहीं, लगभग असंभव हो जाता है।

मुख्य चुनौतियां:

सबसे बड़ी बाधा जन-जागरूकता का अभाव है, जिसके कारण आम जनता की भागीदारी सीमित रह जाती है और पंचायत संस्थाओं को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया, उसके महत्व और योजनाओं के लाभों के प्रति समुदाय में जानकारी और रुचि का अभाव भी इसकी प्रभावशीलता को कमजोर करता है। इसके अतिरिक्त, अंकेक्षण के निष्कर्षों पर ठोस कार्रवाई का अभाव एक गंभीर चिंता है—न तो उल्लंघनों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है और न ही इन निष्कर्षों को नीतिगत सुधारों का आधार बनाया जाता है।

समाधान के उपाय:

इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है कि सामाजिक अंकेक्षण को निर्णय-प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में मान्यता दी जाए और इससे प्राप्त तथ्यों को नीति निर्माण का आधार बनाया जाए। साथ ही, एक सुदृढ़ एवं स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए, जो अंकेक्षण निष्कर्षों पर निष्पक्ष रूप से कार्रवाई सुनिश्चित करे। जन-जागरूकता और सहभागिता को बढ़ावा देकर ही सामाजिक अंकेक्षण को वास्तविक अर्थों में प्रभावी और परिवर्तनकारी बनाया जा सकता है।

सामाजिक अंकेक्षण को वास्तविक अर्थों में जनोन्मुखी बनाने के लिए आवश्यक है कि आमजन की व्यापक और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इसके लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसे आधुनिक माध्यमों के जरिए जागरूकता फैलाना तथा स्मार्टफोन और एप आधारित तंत्र को अपनाकर प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना अनिवार्य है।

अंकेक्षण से पूर्व सामाजिक अंकेक्षकों द्वारा बड़े पैमाने पर सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) गतिविधियां संचालित की जानी चाहिए, जिसके लिए ग्रामीण विकास विभाग द्वारा सोशल ऑडिट यूनिट को पर्याप्त वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।

साथ ही, योजनाओं के लाभों को जन-जन तक पहुंचाने हेतु फोकस ग्रुप चर्चा, स्वयं सहायता समूहों, युवा मंडलों और उप-ग्राम सभाओं के माध्यम से जागरूकता और सहभागिता का सशक्त वातावरण तैयार करना होगा, तभी सामाजिक अंकेक्षण अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकेगा।

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